अनोखा अतिथि सत्कार – पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

बहुत समय पहले की बात हैं, एक घने वन में क्रूर बहेलिया अपने शिकार की खोज में इधर-उधर भटक रहा था। सुबह से शाम तक भटकने के बाद एक कबूतरी उसके हाथ लग गई और कुछ क्षण बाद बहुत तेज वर्षा होने लगी। सर्दी से कांपता हुआ बहेलिया वर्षा से बचने के लिए सुरक्षित स्थान की खोज में भटकता हुआ एक वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया।

कुछ देर बाद वर्षा थम गई, बादल छंट गए और आसमान साफ हो गया। उसी वृक्ष की शाखा पर बैठा कबूतर अपनी कबूतरी के न आने पर बहुत ही चिन्तित था। अपनी गृहणी के बिना घर को सुना मानता हुआ वह कबूतर पत्नी के लिए विलाप करने लगा। पति के वियोग को सुनकर उस वृक्ष के निचे बैठे बहेलिए के बंधन में पड़ी कबूतरी अपने आप को धन्य मानते हुए बोली- ‘स्वामी, अपने मन को दुखी मत करो, मै जान गई हु कि तुम मुझे कितना प्रेम करते हो। तुम्हारा विलाप सुनकर मेरा मन तड़प उठा हे।’

पत्नी की आवाज सुनकर उसने शाख पर बैठे-बैठे ही निचे देखा, उसकी पत्नी एक बहेलिए के बंधन में थी।

‘ देवी! तुम यहाँ हो।’ कबूतर खुशी से झूम उठा।

‘स्वामी! जब आप मुझ पर प्रसन्न हे, तो मै समझती हूँ सारे देवता की मुझ पर प्रसन्न हैं। सत्य तो यह हे की स्त्री के लिए पति से बड़ा कोई दूसरा देवता हे ही नहीं। शास्त्रों में भी पति को परमेश्वर कहा गया है। विवाहिता के जीवन ईश्वर के बाद उसी का स्थान है। ऐसे पति की पूजा न करनेवाली स्त्री तो अधम ही कहलाती है।’ कबूतरी ने पति के प्रति अपार स्नेह दर्शाते हुए कहा।

‘तुम धन्य हो देवी ।’ कबूतर ने गदगद होते हुए कहा।

‘पतिदेव! अब मै आपके हित की बात करती हु, आप ध्यानपूर्वक सुने। यह वृक्ष हमारा निवास हे और यह बहेलिया इसकी छत्रछाया मै बैठ हे हमारा शरणागत और अतिथि हैं। यह भूख और प्यास से व्याकुल है। इसकी सेवा करना हमारा धर्म है। आप यह कदापि मत सोचिये की इसने आपकी पत्नी को बंदी बना रखा है। क्योंकि दरिद्रता, रोग, दुःख, बंधन तथा विपत्ति आदि तो हमारे पापो का प्परिणाम है। दुःख देने वाला व्यक्ति तो निमित मात्र है। यह व्यक्ति निमित न बनता तो कोई दूसरा बनता। दुःख भोगने वाले ने तो दुःख भोगना ही है। इसलिए मेरे बंधन की बात को भूल कर आप इस बहेलिए का यतोचित आतिथ्य करके अपने कर्त्यव्य का निर्वाह करे।’ कबूतरी उंच-नीच का वर्णन करते हुए पति के सामने अपनी इच्छा प्रकट की।

पत्नी की इच्छानुसार बड़े ही शांत श्वर में बहेलिए के पास आकर कबूतर ने उसे कहा-‘श्रीमान! हमारे निवास मे आपका स्वागत है, आप मेरे अतिथि है। अतः आप मुझे बताइए कि मै आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? अतिथि भगवान का रूप होता है, इसकी सेवा करना हर गृहस्थ का कर्तव्य है।’

‘वर्षा हो चुकने के कारण तेज और ठंडी हवाए चल रही है, जिससे मुझे काफी ठण्ड लग रही है। किसी प्रकार मुझे ठण्ड से बचाने की व्यवस्था करे।’ बहेलिए ने कहा।

बहेलिए की बात सुनकर कबूतर ने उड़ान भरी और थोड़ी ही देर मै उसके आगे सुखी लकडियो का ढेर लगा दिया और फिर कही से अंगारा लाकर उन लकडियो में आग लगा दी। आग की गर्मी से बहेलिए को काफी आराम मिला और उसकी ठण्ड जाती रही। उसकी कंपकपी रुक गई। वह काफी प्रसन्न और स्वस्थ अनुभव करने लगा।

‘मैं कितना अभागा हूँ कि घर आये अतिथि को खिलाने के लिए मेरे पास इस वक्त कुछ भी उपलब्ध नहीं है।’ कबूतर ने अपनी बेबसी जताई।

‘अतिथि का सम्मानजनक रूप से स्वागत करना ही बहुत हैं। भूख तो बर्दास्त की जा सकती है लेकिन अपमान नहीं।’ बहेलिए ने कहा।

‘श्रीमान! आप चिंता न करे, मैं अपने आप को आग में फेंकता हूँ। आप मेरा मांस खाकर अपनी भूख शांत करे।’ यह कहकर कबुतर ने अपने को आग में झोंक दिया।।

कबूतर के इस त्याग को देखकर बहेलिए का दिल भर आया और उसे अपने आप पर ग्लानी होने लगी। उसने अपने धंधे को तुच्छ और निति के विरूद्ध मानते हुए उसे बदलने का दृढ़ निश्चय कर लिया और कबूतरी को तुरंत ही अपने बंधन से मुक्त क्र दिया।

अपने पति के आत्मदाह क्र लेने से विधवा कबूतरी अपने जीवन को व्यर्थ मानती हुई रोती-बिलखती उसी अग्नि मै प्रविष्ट हो गई। कबूतर और कबूतरी के जलकर अपने प्राण त्यागने के बाद बहेलिए काफी दुखी हुआ। उसने सोचा इस पक्षी दम्पति की मौत का जिम्मेदार वह स्वय है। इसलिए उसने घर जाकर सुख भोगने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया और घने वन में जाकर कन्दमूल और फल खाकर अपना जीवन व्यतीत करने लगा।

कथा-सार

अतिथि को भगवान का स्वरूप मानकर उसकी सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। यही गृहस्थ का कर्तव्य है। अतिथि चाहे शत्रु ही क्यों न हो, उसकी सेवा करने से मोक्ष की प्राप्ति संभव हे। कबुतर-कबूतरी ने अपने प्राणों की आहुति देकर भी आतिथ्य-धर्मं का पालन किया और देवकृपा के भागी बने।

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