
पहाड़ी की तलहटी में बना एक सुंदर गांव था. जैसा सुंदर वह गांव था, वैसा ही सुंदर उस गांव का नाम था- सुंदरपुर! गांव सुंदरपुरमें वैसे तो सुख-शांति का वास था लेकिन वहां के सरपंच की पत्नी कुमति बड़े ही दुष्ट स्वभाव की स्त्री थी. उसके कुटिल स्वभाव से सभी घरवाले परेशान थे. लेकिन अपनी सीधी-सादी बहू सुकन्या को वह कुछ ज्यादा ही परेशान करती थी, उसे सताने में कुमति को विशेष आनंद आता था.
बेचारी सुकन्या सुबह मुंह अंधेरे बिस्तर से उठकर काम पर जुट जाति और अर्धरात्रि होने पर कहीं बिस्तर में सोने को मिलता. इस पर भी कुमति की निगाहों में सुकन्या खटकती रहती. एक दिन सुबह सुकन्या घर में झाड़ू-बुहारी कर रही थी की उसकी सास कुमति वहां आई और बोली, ‘तेरे हाथों में जान नहीं है क्या? जरा जल्दी-जल्दी हाथ चला. मैं मंदिर जा रही हूं, मेरे आने तक खाना तैयार रखना, आते ही खाऊंगी. और सुन, एक भी दाना अन्न का बरबाद न होने पाए.’ सुकन्या क्या कहती बेचारी, चुपचाप स्वीकृति में गरदन हिला दी.
घर की सफाई करके सुकन्या तुरंत खाना बनाने में जुट गई. खाना बनाते समय वह सोच रही थी-एक पल के लिए भी तो चैन की सांस नहीं ले पाती लेकिन सासुजी हैं की हर काम में मं-मेख निकालती हैं, उनके ताने देने की आदत न जाने कब जाएगी.
तभी बाहर से दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. सुकन्या ने सोचा-अभी भोजन तैयार ही हुआ है, लगता है सासुजी जल्दी लौट आई हैं. उसने उठकर दरवाजा खोला तो देखा एक संन्यासी खड़ा था. वह बोला, ‘बेटी! तेरा सुहाग अमर रहे, बाबा को कुछ भोजन करा दे.’
सुकन्या बहुत ही सुशील तथा संस्कारी स्त्री थी. उसने सोचा-साधु महाराज को भोजन करा तो दूं, पर कहीं उसकी सास कुमति आ गई तो खैर नहीं. कुछ देर सोच-विचार करने के बाद उसने संन्यासी को भोजन करने हेतु अंदर आने को कहा. उसके मन में पुकार उठी-सास से डरना कैसा? मैं अपने हिस्से का भोजन दे रही हूं. वह साधु को भीतर ले गई और आतिथ्य धर्म का पालन करते हुए उसे भोजन करने लगी.
अभी साधू भोजन कर ही रहा था कि सुकन्या की सास आ गई. साधु को घर के भीतर बैठे भोजन करता देख, उसका पारा सातवें आसमान पर जा चढ़ा. बली, ‘यहां कोई भंडारा या लंगर नहीं चल रहा, उठ भिखमंगे, बाहर नीलक.’ सुकन्या ने सास को रोकने की चेष्टा की लेकिन उस दुष्ट स्त्री ने संन्यासी को धक्के मारकर हर से निकल दिया. अब उसका क्रोध सुकन्या पर टुटा, ‘तुससे कह था अन्न का एक दाना भी बरबाद न करना और तू….’
सुकन्या डरते-डरते बोली, ‘मैने तो उसे अपने हिस्से का भोजन दिया था, एसमें इतना भला-बुरा कहने की क्या बैट है. अतिथि तो भगवान स्वरुप होता है, आतिथ्य धर्म का पालन तो हर गृहस्थ को करना चाहिए.’ काफी देर तक सास-बहू की तकरार चलती रही. अंत में उस कुटिल सास ने सुकन्या को भी धक्के मारकर घर से निकल दिया. वह बेचारी रोटी-कलपती दरवाजा पिटती रह गई लेकिन कुमति तो जैसे पत्थर बन गई थी, उसक आदिल न पसीजा. अब सुकन्या के पास एक ही रास्ता शेष बचा था कि अपने के घर लौट जाए.
उसका मायका वहां से काफी दूर था और बीच में घना जंगल भी पड़ता था. सुकन्या भूख-प्यास से निढाल चली जा रही थी अचानक जोरों से बादल गरजे और मुसलाधार वर्षा शुरू हो गई. वर्षा से बचने के लिए उसने एक पेड़ की शरण ली लेकिन वर्षा का वेग इतना तीव्र था कि बचना मुशिकल हो गया. उसी पेड़ में एक कोटर बना था. सुकन्या यह सोचकर उसमें घुस गई कि वर्षा रुकने पर बाहर निकल आउंगी.
वास्तव में वह पेड़ दो राक्षसियों का निवास स्थान था. वू भी वर्षा से परेशान होकर पेड़ की ओर ही आ रही थीं. एक बोली, ‘अब तो चला भी नहीं जाता वर्ना मन तो कर रहा था कि सोना टापू चली जाऊ.’ दूसरी राक्षसी बोली, ‘इसमें क्या बड़ी बात है, यह पेड़ हमें अभी उड़ाकर वहां पहुंचा देगा.’ कहकर दोनों पेड़ की शाख पर बैठ गई.
उधर थकी-हारी सुकन्या की कोटर में घुसते ही नींद आ गई थी लेकिन पेड़ के उड़ने से लगनेवाले झटकों से उसकी नींद खुल गई. पेड़ को उड़ता देखकर वह घबरा गई थी, शेष कसर बाहर झांककर देखने से पूरी हो गई, जब उसने पेड़ की साख पर दो राक्षसियों को बैठे देखा. अंततः उसने परिस्थितियों से समझौता करते हुए सोचा, जो होगा अच्छा ही होगा.
कुछ ही देर की उड़ान के बाद वह पेड़ सोना टापू पहुंचकर उतर गया. दोनों राक्षसियों को भूख लग आई थी, सो वे दोनों शिकार की तलाश में निकल गई. उनके जाने के बाद डरी-सहमी सुकन्या कोटर से बाहर निकाली और चैन की सांस भरते हुए हाथ-पांव सीधे किए.
जैसे ही उसने सोना टापू पर फैली रेत देखी तो चौंककर बदबदा उठी,’यह रेत तो चमचमा रही है.’ गिर उसने राउत हाथ में उठाई तो जोर से चिल्लाई, ‘अरे यह तो सोने की रेत है.’ अपनी धोती के आंचल में वह जितनी रेत बांध सकती थी, बांध ली और पुनः कोटर में घुस गई.
तभी दोनों राक्षसियों पेड़ की और वापस आई. एक बोली. ‘भरपेट खाकर तृप्ति हो गई, अब वहीँ लौट चलते हैं, जहां से आए थे.’ थोड़ी ही देर में वह पेड़ फिर वहीं पहुंच गया.
पौ फटने पर सुकन्या उस राक्षसियों की भय से कोटर में ही छिपी रही, जब किसी कार्यवश वे वहां से गई तो वह बाहर निकल आई और घर कि ओर चल दी. वह सोच रही थी-इतना सोना देखकर सासुजी खुशी से पागल हो जाएंगी और यंके सभी गिले-शिकवे दूर हो जाएंगे. घर के द्वार पर पहुंचते की सुकन्या बोली, ‘देखो सासुजी, मैं क्या लाई हूं.’ और यह कहते हुए घर के भीटर प्रवेश कर सोना कर सोना मिलने की पूरी घटना सास को बता दी.
कुमति कुटिल तो थी ही, बोली, ‘बहुत काम सोना लाई है तू.’ ‘सासुजी, हमारी तीन-चार पीढियों के लिए काफी है.’ सुकन्या ने उतर दिया.
‘अरी मुर्ख! सोना भी कभी काफी होता है, जितना हो उतना काम है. अब मैं जाउंगी, फिर देखना कितना सोना बटोरकर लाती हूं.’
सुकन्या ने अपनी सास को बहुत समझाया, पर उस लालची मूढ़ स्त्री ने उसकी एक न सुनी और जाकर उसी पेड़ उन्हें लेकर उड़ चला. कुमति उत्सुकतावश जाग ही रही थी, तभी उसके कानों में एक राक्षसी का स्वर टकराया, ‘ आज मछली खाने को मन कर रहा है.’ दूसरी ने उतर दिया, ‘चलो, मत्स्य द्वीप पर चलते हैं, वहां बहुत मछलियां मिल जाएंगी खाने को.’
उनकी बातों को सुनकर कोटर में बैठी लालची कुमति स्वयं पर संयम न रख सकी और बोल पड़ी, ‘अरे! तुम सोना टापू क्यों नहीं जा रहीं?’ उसकी आवाज सुनने की देर थी कि राक्षसियों समझ गई की जरुर कोई चोर पेड़ पर छिपा बैठा है और उन्होंने कुमति को कोटर से उठाकर बाहर फेंक दिया. धरती पर गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए.
कथा-सार
मनुष्य को लालच कभी नहीं करना चाहिए. जितना मिल जाए, जो मिल जाए उसी में संतोष करा चाहिए. अधिक पाने की लालसा में हाथ आया भी जाता रहता है. यह भी ध्यान रहे, की लालची व्यक्ति का हश्र एक दिन कुमति जैसा ही होता है.