आंखोंवाला अंधा – पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

चित्रनगर में वीरवर नामक एक रथकार रहता था। वह सीधा-सादा और व्यवहार-कुशल था। वह जितना भोला था, उसकी पत्नी कामदमनी उतनी ही दुष्ट और चरित्रहीन थी। पूरें गांव और नगर में उसकी दुष्टता के चर्चे हर किसी की जुबान पर थे। वीरवर पत्नी के दुराचरण से बहुत दुखी था। उसका दुखी होना स्वभाविक भी था, क्यूंकि जिस पुरुष कि स्त्री कुंटिल हो या आमिर, अपना उपहास की द्रष्टि से देखते हें। कोई भी व्यक्ति-गरीब हों या आमिर, अपना उपहास सहन नहिं कर सकता।

वीरवर की पत्नी कामदमनी कभी भी रंगे हाथों पकड़ी नहीं गई थी। इसकी वजह से वह स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने में सफल हो जाती थी। हारकर रथकार वीरवर ने काफी सोच-विचार करने के बाद उसे रंगे हाथों पकडने की योजना बनाई। अपनी योजना को कार्यरूप देने के लिए एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा-‘प्रिये! मुझे पास के ही एक गांव में एक  सप्ताह के लिए काम मिला है। में उन दिनों वहीँ रहूंगा, मेरे खाने के लिए कुछ मीठा-नमकीन तैयार कर दो।’

‘स्वामी! तुम्हारे बिना में अकेली केसे रह पाउंगी?’ अपने अंतर्मन की खुशी को छिपाते हुए कामदमनी ने पति के अलगाव का दुख दर्शाने का अभिनय किया।

‘ अच्छे धन की प्राप्ति होगी तभी तो दुसरे गांव में जा रहा हूं।’ वीरवर ने कहा।

कामदमनी मन-ही-मन खुश होती हुई लगभग लम्बे समय तक खराब न होनेवाली खाने की चीजें तैयार करने में जुट गई।

अगले दिन प्रातःकाल वीरवर के प्रस्थान करते ही उसने अपने प्रेमी को खबर भिजवा दी कि वह शाम होते ही घर पर आ जाए। रथकार वीरवर ने सारा दिन वन में इधर-उधर भटकते हुए गुजार दिया और शाम होते ही पिछले द्वार से घर में घुस गया और पलंग के नीचे छिपकर बेठ गया।

अपने प्रेमी देवदत के आते ही कामदमनी का चेहरा खिल उठा। उसे पलंग पर बैठाया और स्वयं दरवाजा अंदर से बंद करने चली गई। सांकल बंद करके जैसे ही वह पलंग पर अपने प्रेमी के पास बैठने लगी वैसे ही उसका पांव नीचे छिपकर बैठे वीरवर से जा टकराया।, धूर्त कामदमनी ने चिल्लाते हुए कहा-‘ मुझ पतिव्रता स्त्री के शरीर को छूने का दुस्साहस न करना, अन्यथा अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से मैं अभी तुझको भस्म कर दूंगी।’

‘दुष्ट ओरत! यदि तू सटी सावित्री है तो फिर मुझे किसलिए बुलाया था?’ कामदमनी के अप्रत्याशित कथन को सुनकर उसका प्रेमी देवदत्त बिगड़कर बोला।

‘ यह सच है कि मैंने तुम्हें बुलाया था, इसकी वजह भी में बताती हूं। आपने शायद मुझे कुलटा और चरित्रहीन समझ लिया था। संदेशवाहक को मैंने तुम्हें बुलाने का प्रयोजन नहिं बताया था। आज प्रातःकाल जब मैं देवी दर्शन के लिए मंदिर में गई तो लोटते वक्त मेंने देवी की यह वाणी सुनी-पुत्री! तुम मेरी भक्त और पतिव्रता स्त्री हो। इसलिए में तुम्हें वक्त से पहले ही बता रही हुहूं कि तुम्हारे पति की आयु मात्र छह माह शेष रह गई है, उसके के बाद तुम्हारे भाग्य में विधवा हो जाने का योग है। यह सुनते ही मैं बेहोश होकर देवी मां के चरणों में गिर गई होश आने पर में विलाप करने लगी। देवी ने मुझे सांत्वना दी, लकिन मेरा विलाप नहिं थमा। मैंने राते-राते देवी मां से पूछा-मां! क्या मेरे पति के प्राण बचाने का कोई उपाय नहिं है। देवी मां से शायद मेरा रुदन सहन नहिं हुआ, इसलिए वह द्रवित होकर बोलीं-पुत्री! उपाय तो हैं, परन्तु तुम करोगी नहीं क्योंकि तुम सती-साध्वी हो। अतः मैं तुमसे परपुरुष का आलिंगन करने की बात कैसे कह सकती हूं? यदि तुम एसा कर सको त५ओ तुम्हारे पति पर आया संकट उस पुरुष पर चला जाएगा।’ यह कहकर वह फुट-फुटकर रोने का अभिनय करबने लगी।

‘रोना-धोना छोड़ो और यह बताओ कि और क्या खा देवी मां ने?’ देवदत्त ने झुंझलाकर पूछा।

‘ इसके आगे और देवी कह भी क्या सकती थी। मैने देवी को प्रणाम किया और घर चली आई। पति को दुख न पहुंचे इसलिए उन्हे कुछ भी नहीं बताया। स्वयं अंदर-ही-अंदर घुलती रही। मैं यह सोचकर काफी परेशान थी कि परपुरुष का आलिंगन कैसे करूं? अपने परिव्रत धर्म की रक्षा कैसे करूं? परन्तु मेरे लिए अपने पति का जीवन सवार्धिक मूल्यवान है। अतः उनकी आयु बढाने के लिए मैं तुम्हारा केवल एक बार आलिंगन करने को सहमत हुई हूं।’ धूर्त कामदमनी ने मनगढ़ंत कहानी गढ़ते हुए कहा।

पलंग के नीचे छिपकर बैठा मुर्ख रथकार वीरवर अपनी दुष्ट पत्नी के कथन पर विश्वास करके पलंग के नीचे से बाहर निकल आया। वह अपने आपको धिक्कारने लगा और पश्चाताप करने लगा कि वह लोगों की बातों में आकर अपनी पतिव्रता पत्नी कामदमनी से बार-बार क्षमा याचना करने लगा। उसने कृतज्ञतावश अपनी पत्नी को उठाकर अपने एक कन्धे पर बैठा लिया और उसके प्रेमी देवदत को भी अपना जीवनदाता मानकर उसे अपने दुसरे कन्धे पर बैठा लिया। मुर्ख रथकार उन दोनों को कन्धों पर उठाए-उठाए इधर-उधर घूमता और नाचता रहा।

कथा-सार

प्रत्यक्ष रूप में देखकर भी उसे झूठे समाधान से, पुण्य समझने के भ्रम को पालना कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा भ्रम तो मुर्ख और अज्ञानी व्यक्ति ही पालते हैं। वीरवर भी कुछ इसी प्रकार धोखा खा गया और कुटिल पत्नी को परपुरुष के संग देखकर भी सती-साध्वी ही समझता रहा।

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