दानी का धन बढ़ता है- पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

शामगढ़ नगर का निवासी सोमिलक जुलाहा बहुत ही कुशल शिल्पी था. वह राजाओं के पहनने योग्य अनेक सुंदर, चित्र-विचित्र पर बहुमूल्य रेशमी वस्त्र बुना करता था. लेकिन फिर भी उसका हाथ तंग रहता था. उसने किसी दूसरे नगर में जाकर काम करने की सोची लेकिन उसकी पत्नी उससे सहमत नहीं था. वह बोली, ‘स्वामी! जो अपने नगर में कुछ अधिक न कर सका हो वह किसी अन्य शहर में भी कामयाब नहीं हो सकता. इसलिए आपको इस कथन में तो मुझे कोई सार नजर नहीं आता की दूसरे शहर में जाने पर आपको अधिक धन मिल जाएगा.’

‘मैं इससे भी बड़े शहर मैं जाउंगा.’ जुलाहे ने पत्नी की बात को काटते हुए कहा.

‘लयलीन सत्य तो यह है की जिस प्रकार मटके को चाहे कुए में डाला जाए अथवा समुद्र में, उसमें जितना स्थान है उसमें पानी उतना ही आएगा. उसी प्रकार मनुष्य भी चाहे एक देश में रहे या दूसरे देश में रहे, उसे उतना ही मिलता है, जितना उसके भाग्य में लिखा होता है. इसलिए मेरे विचार से आप देश-विदेश भटकने का ख्याल अपने मन से निकाल दें.’ पत्नी ने जुलाहे को समझते हुए कहा.

‘प्रिये! तुम गलत सोच रहे हो. जिस प्रकार ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी प्रकार परिश्रम के बिना भाग्य में लिखा भी प्राप्त नहीं होता. सिंह जैसे शक्तिशाली पशु को भी भोजन के लिए दौड़-धूप करनी ही पड़ती है. अगर वह भी एक जगह भाग्य के भरोसे पड़ा रहेगा तो भोजन स्वयं चलकर उसके मुख में नहीं आएगा.’

इस प्रकार अपने निर्णय को शी मानते हुए सोमिलक जुलाहा अपनी जरुरत का सामान लेकर एक सम्रद्ध नगर की ओर चल दिया. संयोगवश वहां उसका काम भली प्रकार जम गया. तीन वर्ष में ही उसने काफी धन कमा लिया. उसने सोचा, काफी धन एकत्रित हो गया है और परदेस का मामला है, इसलिए क्यों न अपने धन को घर में छोड़ आऊं. मन में इस प्रकार का विचार बनाकर उसने अपनी जमा-पूंजी को गांठ में बांधा और घर की ओर चल दिया.

जुलाहे को चलते हुए शाम हो गई और धीरे-धीरे घना अंधेरा छा गया. जुलाहा उस वक्त एक वन में से गुजर रहा था. स्थिति की भयंकरता का अनुमान लगाकर समीप के एक वृक्ष पर चढ़ गया और उसके पतों में अपने आपको छिपाकर सो गया.

गहरी नींद में सोए उस जुलाहे ने सपने में दो पुरुषों की बातचीत सुनी. उनमें से एक कह रहा था, ‘परिश्रम! तुम भली प्रकार से जानते हो कि इस जुलाहे के भाग्य में दाल-रोटी से अधिक कुछ नहीं है, फिर तुमने इसको इतना धन क्यों दे दिया?’

‘भाग्यदेव! मेरा तो धर्म ही यही है, जो खोदेगा उसे जल अवश्य प्राप्त होगा ही. वह जल मीठा है अथवा खारा, यह देखना तुम्हारा अधिकार क्षेत्र है, इस जुलाहे ने श्रम किया है और मैंने उसे उसका फल दिया है.’ परिश्रम ने अपना पक्ष रखते हुए कहा.

जुलाहा एकाएक चोंककर जाग उठा और उसने कमर में बंधी पोटली को देखा. पोटली को खाली पाकर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वह सोचने लगा कि इतना परिश्रम करने के बाद कमाया मेरा धन अचानक कहां चला गया. निराश होकर जुलाहा फिर उसी नगर की और लौट पड़ा.

जुलाहा ने तीन वर्ष तक घोर परिश्रम करके फिर ढेर सारा धन एकत्रित कर लिया और अपने घर की और रवाना हो गया. रास्ते में फिर शाम हो गई और देखते-ही-देखते अंधेरा छा गया, परन्तु इस बार उसने विश्राम न करने का निश्चय किया और चलता ही रहा. अभी वह थोड़ी दूर ही गया होगा की तीन वर्ष पहले सपने में देखे दो पुरुष उसे सामने से आते दिखाई दिए. उन दोनों की बातचीत भी तीन वर्ष पूर्व सपने में जैसी ही थी. सोमिलक ने उनकी बातचीत को सुनने के उपरांत अपनी थैली को देखा और उसे खाली पाकर वह मुर्छित हो गया. अपने धन के अप्रत्याशित रूप से नष्ट हो जाने से दुखी जुलाहे ने निर्धनता का जीवन जीने की अपेक्षा आत्महत्या कर लेना ही उपयुक्त समझा.

उसे आत्महत्या करते देख भाग्यदेव ने प्रकट होकर कहा, ‘वत्स! तुमने परिश्रम अवश्य किया है, परन्तु जब तुम्हारे भाग्य में धन है ही नहीं तो मैं तुम्हें कैसे दे सकता हूं. तुम्हारे पास आया धन ठीक नहीं सकता.’

‘हें देव! मैं निर्धनता का जीवन नहीं गुजार सकता. इसका कोई-न-कोई उपाय अवश्य कीजिए.’ जुलाहे ने विनती करते हुए कहा.

‘ठीक है! तुम मुझ से वर मांग लो>’ भाग्यदेव ने जुलाहे को उपाय बताया.

‘मुझे अपार धन की इच्छा है, बस मुझे यही वर दीजिए.’ जुलाहे ने अपनी हार्दिक इच्छा प्रकट करते हुए कहा.

‘वर तो मैं तुम्हें दे दूंगा, परन्तु याद रखो तुम अपने धन का उपयोग नहीं कर पाओगे.’

‘कोई बात नहीं, धन का अपना अलग ही महत्व होया है.’ जुलाहे ने तर्क देते हुए कहा.

‘यदि तुम्हारी इच्छा भटकने की ही है तो तुम अपने पुराने स्थान वर्धमानपुर लौट जाओ. वहां दो बनिये रहते हैं. एक का नाम गुप्तधन है और दूसरे का उपमुक्तधन. तुम उन दोनों की प्रकृति का अध्ययन करो और फिर मुझसे अपनी इच्छानुसार वर मांग लेना. आज से ठीक छह महीने बाद मैं तुम्हें यहीं पर मिलूंगा.’ भाग्यदेव ने उससे कहा और तुरंत ही अंतर्धान हो गए.

भाग्यदेव के वचनों को सुनकर सोमिलक पुनः वर्धमानपुर लौट आया. वहां पहुंचते-पहुंचते वह काफी थक गया यह. शाम हो गई थी. वह गुप्तधन के घर अतिथि के रूप में गया और कहने लगा, ‘मैं एक परदेसी हूं, रातभर विश्राम के लिए आश्रय चाहता हूं.’

जुलाहे ने सुबह उठकर देखा की गुप्तधन अस्वस्थ हो गया है, जिसके फलस्वरूप उसने उस दिन भोजन नहीं किया. इस प्रकार अतिथि को खिलाए भोजन का हिसाब बराबर हो गया.

अगले दिन सोमिलक उपयुक्तधन के घर अतिथि के रूप में पहुंचा. उपयुक्तधन ने बड़े ही प्रेम और आदरपूर्वक अतिथि का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन आदि से उसे संतुष्ट किया.

जुलाहे और उपयुक्तधन की स्तिथि का अध्ययन करने के बाद सोमिलक इस निर्णय पर पहुंचा कि संचयरहित उपयुक्तधन का जीवन ही सफल है. सोमिलक ने निश्चित समय और निश्चित स्थान पर पहुंचकर भाग्यदेव से वर मांगते हुए कहा, ‘मुझे उपयुक्तधन जैसा बनने का वर दीजिए.’

‘तथाअस्तु!’ यह कहकर भाग्यदेव अंतर्धान हो गए.

सोमिलक भाग्यदेव से मनचाहा वर मांगकर घर लौट आया और सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगा.

कथा-सार

‘दान दिए धन नहीं घटता’ और ‘दान किए बिया सद्गति नहीं मिलती’-दोनों ही बातें अपनी-अपनी जगह ठीक हैं. जो प्राणी अर्जित तथा संचित धन का कुछ भाग दान-पुण्य में नहीं लगाता, उसका धन नष्ट हो जाता है, और दान देनेवालों पर लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और सद्कायों में धन व्यय कर अपना परलोक सुधार लेता है.

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