
वर्षा ऋतु के दिन थे. कोसलगढ़ में एक दरिद्र ब्राह्मण अपनी पत्नी दुलारी के साथ किसी प्रकार जीवनयापन कर रहा था. गरीबी में दिन बिताते काफी समय हो जाने के कारण दुलारी का स्वभाव कुछ चिड़चिड़ा-सा हो गया था.
एक रात घनघोर वर्षा हो रही थी और वह विप्र ब्राह्मण अपनी टपकती हुए झोपड़ी में पत्नी के साथ बैठा था. उसकी पत्नी दुलारी न जाने किस बात पर उसे भला-बुरा कह रही थी. प्रतिदिन होनेवाले इस चख-चख को ब्राह्मण अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर चूका था. दुलारी अपनी ही रोऊ में बड़बड़ाए जा रही थी कि तभी ब्राह्मण बोला, ‘भाग्यवान! कल गंगा-स्नान(मकर-सक्रांति) का दिन है. लोग इस दिन-पुण्य कर अपना परलोक सुधारते है, भिक्षाटन के लिए मेरा दुसरे गांवों में आना-जाना होगा, खूब दक्षिणा मिलेगी.’ थोडा विराम लेकर वह फिर बोला, ‘मकर सक्रांति के दिन तिलों के दान का बहुत महत्व है, तुम भी किसी पंडित को थोड़े टिल दान कर देना.’
ब्राह्मण के यह वचन सुनते ही दुलारी के संयम का बांध टूट गया. पति को ताने देती हुए बोली, ‘तुम जैसे फक्कड़ के यहां सुखी रोटी तो मुशिकल से मिलती है, तिल कहां से लाऊं? मैं तो अच्छा खाने-पहनने को तरस गई हूं और तुम तिल दान करने की बात कर रहे हो?’
पत्नी के कठोर किन्तु सत्य वचन सुनकर ब्राह्मण कुछ देर तो चुप ही बैठा रहा. फिर दान करने की महिमा समझाते हुए अपनी पत्नी को संबोधित किया, ‘देखो गृहलक्ष्मी! सुखी मनुष्य वहीँ है जो संतोषी होता है. यदि हमारे पास खाने को एक रोटी क्यों न हो, तो भी आधी दान कर देनी चाहिए. दान करनेवाले से सभी प्रसन्न रहते हैं, धनी व्यक्ति को बहुत कुछ दान करने से ही मिल जाता है. यश, धन व मान मांगे से मिलते तो कोई भी व्यक्ति दरिद्र नहीं होता. अतः जो भी है, जैसा भी है उसी में संतोष करना चाहिए. श्रध्दा और सामर्त्यानुसार व्यक्ति को दान करते रहना चाहिए. जब तुम कुछ देने की चाह नहीं रखती तो फिर कुछ पाने की चाहत क्यों?’
ब्राह्मण के या वचन दुलारी को भीटर तक कचोट गए. बोली, ‘स्वामी! मेरे पास कुछ टिल हैं, कल उनको किसी पंडित को दान कर दूंगी.’
इसी प्रकार बातचीत करते दोनों की न जाने कब आंख लग गई. सवेरा होने पर ब्राह्मण उठा और भिक्षाटन के लिए दुसरे गांव चला गया. जाते-जाते भी वह दुलारी को टिल दान करने को कहना नहीं भुला.
सूर्य चढ़ आने पर दुलारी ने तिलों को धूप में सुकने के लिए रख दिया और स्वयं घर के काम-काज में जुट गई. तभी एक आवारा कुते ने तिलों पर मूत्र कर दिया. दुलारी भी संयोगवश यह सब देख चुकी थी. उसने सोचा, ‘टिल तो अपवित्र हो गई हैं, अब इन्हें दान करना ठीक नहीं.’
दुलारी स्वयं को बहुत ही चतुर समझती थी. उसने सोचा-क्यों न पड़ोसन के घर जाकर कहूं कि एन काले तिलों के बदले मुझे सफेद टिल दे दे.
यही सोचकर वह अपनी पड़ोसन के घर की ओर चल दी. वहां पहुंचकर उसने अपनी बात अभी पूरी ही की थी कि पास ही खेल रहा पड़ोसन का दस वर्षीय पुत्र बोल उठा, ‘मां! सावधान रहना, मुझे तो एसमें कोई चाल लगती है, जो यह काले तिल के बदले सफेद तिल मांग रही है. मकर सक्रांति के दिन तो काले तिलों के दान करने से ही पुण्य मिलता है, फिर यह उलटी गंगा कैसे बह रही है?’
उस पड़ोसन औरत ने अपने पुत्र की बात सुनकर तिल बदलने से मना कर दिया. दुलारी की साड़ी चालाकी धरी रह गई और वह अपना-सा मुंह लेकर घर वापस आ गई.
कथा-सार
मन में किसी भी प्रकार की बुराई तथा विचार को फन उठाने से पहले ही कुचल देना चाहिए. दुर्विकारों से भरा मन व्यक्ति को कुटिल बनाता है. किसी के प्रति दुराग्रह रखने से पहले यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है. जैसे दुलारी की कुटिलता उसी पर भारी पड़ी.