आदत से लाचार- पंचतंत्र की कहानी

0
373
panchtantra ki kahaniya

तुगलकनगर के राजा के भवन का शयनकक्ष अत्यंत सुंदर तह. राजा के प्रतिदिन के इस्तेमाल में आनेवाले वस्त्रों में एक जूं रहती थी. वह वह राजा का रक्त चूसकर आनंद से जीवन व्यतीत कर रही थी.

एक दिन कहीं से घूमता-फिरता एक खटमल राजा के शयनकक्ष में घुस आया. उसे देखकर जूं का मन खिन्न हो गया. उसने सोचा यह भी खून चूसनेवाला जीव है और मैं भी. यह तो एक म्यान में दो तलवारों वाली बात हो गई. अतः जूं ने उसे क्रोधित स्वर में संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं यहां बरसों से रह रही हूँ’ राजा के इस शयनकक्ष पर मेरा अधिकार है. इसलिए तुम तुरंत यहां से चले जाओ.’

‘घर में आए अतिथि के प्रति आपका ऐसा अपेक्षापूर्ण व्यवहार शोभा नहीं देता. मैं तो यहां एक विशेष प्रयोजन से आया हूं.’ खटमल ने विनम्र स्वर में जूं से कहा.

‘किस प्रयोजन से आए हो?’ जूं ने शंकित स्वर मेनन पूछा.

‘मैंने अनेक प्रकार का मनुष्यों के अनेक प्रकार के स्वादवाला रक्त चूसा है, परंतु वे सभी रक्त लोगों के विशेष प्रकार के खान-पान के कारण खटट, कड़वे , तीखे और कसैले ही थे. मीठे रक्त को चूसने की मेरी कामना अभी तक अधूरी ही है. यहां का राजा अनेक प्रकार के उतम प्रदार्थों का सेवक करता है. इससे उसका रक्त अवश्य ही मधुर स्वादवाला होगा.’ उस खटमल ने अपनी इच्छा जूं पर प्रकट की.

‘राजा के खून पर सिर्फ मेरा अधिकार है. मैं इसमें किसी को अपना भागीदार नहीं बनने दूंगी.’ जूं ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘मैं यहां हमेशा के लिए नहीं आया हूं. केवल दो-एक दिन के लिए मुझे रहने की अनुमति देने की कृपा करो, मैं तुम्हारा बहुत आभारी रहूँगा.’

‘ तुम्हारा क्या विशवास, वैसे भी तुम चंचल स्वभाव के हो?’ जूं ने अपना संदेह व्यक किया.

‘मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मधुर रक्त का स्वाद लेने की अपनी इच्छा की पूर्ति होते ही मैं यहां से अपने आप चला जाऊंगा. तुम मुझ पर विशवास करो.’ खटमल ने जूं को समझाते हुए कहा.

‘ठीक है. लेकिन एक बात का अवश्य ध्यान रखना, राजा के निद्रामग्न होने तक धैर्य धारण कर सकते हो तो मैं तुम्हें यहां रहने की अनुमति दे सकती हूं.’

‘ मुझ पर विशवास रखो. जब तक राजा का खून नहीं चूस लोगी, तब तक मैं धैर्य धारण किए हुए प्रतीक्षा करूंगा.’ खटमल ने उसे विशवास दिलाया.

‘ठीक है, दो-चार दिन तुम यहां रह सकते हो.’ जूं ने खटमल को अनुमति प्रदान कर दी.

रात होने पर जब राजा अपने शयनकक्ष में आकर लेटा तो खटमल अपनी जिव्हा पर काबू नहीं रख पाया. उसमें राजा के निद्रामग्न होने तक की प्रतीक्षा करने का धैर्य न रहा और वह जागते राजा को ही काटने और उसका रक्त चूसने लगा. खटमल के लिए अपने स्वभाव को बदलना सम्भव नहीं हुआ.

सुई की जैसी चुभन पैदा करनेवाले खटमल के डंक से बेचैन होकर राजा चिल्लाकर उठ खड़ा हुआ. महल केबाहर खड़े नौकर महाराज की आवाज को सुनकर तुरंत उनके शयनकक्ष में आ पहुंचे और बिछौने तथा ओढ़ने के कपड़ों की बारीकी के साथ छानबीन करने लगे. यह सब देखते हुए अवसर पाकर खटमल तो भाग खड़ा हुआ, मगर कपड़ों के जोड़ में छिपकर बैठी जूं पर नौकरों की नजर पड़ गई और नौकरों ने तुरंत उस जूं को मार डाला.

कथा-सार

किसी भी प्राणी का स्वभाव बदल पाना बहुत मुशिकल काम है. पानी अग्नि का विरोधी है-पानी चाहे खौलता हुआ हो या ठंडा-आग पर डालने पर उसे बुझा देता है. यह पानी का स्वभाव है. बिच्छु को आप लाख परम करिए, लेकिन वह डंक मारना नहीं छोड़ेगा, क्योंकि ऐसा करना उसका स्वभाव है. यहीं खटमल ने भी किया. अतः किसी को भी शरण देने से पहले आगा-पीछा विचार लेना चाहिए.

 

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

As you found this post useful...

Follow us on social media!

We are sorry that this post was not useful for you!

Let us improve this post!

Leave a Reply