अपने हुए पराये – पंचतंत्र कहानी

0
155
panchtantra ki kahaniya

एक घने जंगल में चण्डरव नामक गीदड़ रहता था. एक दिन वह भूख से व्याकुल होकर नगर में घुसा तो वहां कुतों ने उस पर धावा बोल दिया. गीदड़ घबराकर इधर-उधर भागने लगा और भागते-भागते एक रंगरेज के घर में जा घुसा और रंग से भरे एक छोटे से तालाबनुमा गडढे में जा गिरा. कुते रंगरेज के घर के बाहर कुछ देर भौंकते रहे. जब कुतों के भौंकने की आवाजें आनी बंद हो गई तो चण्डरव उस छोटे-से तालाब में से बाहर निकलकर आया. उसने देखा कि उसके शरीर का रंग बदलकर नीला हो गया है. उस तालाब में दरअसल नीला रंग घुला हुआ था.

जब वह जंगल में गया तो वहां के पशु उसे अजीब जीव मानकर उससे डरने लगे और दूर भागने लगे. चतुर चण्डरव के मन में एक विचार आया कि जब जंगल के सब पशु उसे खतरनाक और खौफनाक जीव समझकर दार रहे हैं तो क्यों न उन्हें और ज्यादा बहकाया और डराया जाए. चण्डरव ने भयभीत पशुओं को आश्वासन देकर अपने पास बुलाकर कहा, ‘ भगवान ने मुझे तुम लोगों का राजा बनाकर भेजा है. इसलिए तुम लोग भय को त्यागकर मेरी छत्रछाया में सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करो.’

चण्डरव की बात सुनकर जंगल के पशुओं ने उसका अभिनंदन किया और उसे अपना स्वामी मां लिया. चण्डरव ने राजसिंहासन संभालते ही शेर को प्रधानमंत्री, बाघ को खाघ मंत्री, चीते को वितमंत्री और भेडिए को रक्षा मन्त्री के पद पर नियुक्त कर ददिया. चण्डरव ने अपनी जाति (गीदड़ों) को प्रशासन में कोई भी महत्वपूर्ण पद नहीं दिया. इतना ही नहीं वह अपनी जाति के लोगों से बात करने में भी शर्म महसूस करने लगा था.

अपनी ही जाति के भाई द्वारा अपनी उपेक्षा को अपना अपमान समझकर गीदड़ों ने एक सभा का आयोजन किया. उस सभा में इसी बात पर विचार-विमर्श हुआ कि अपनी ही जाती के राजा द्वारा उनकी उपेक्षा और अपमान हो रहा है. एक गीदड़ सिंह और बाघ पर शासन कर रहा है.

एक वृद्ध गीदड़ ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘ भाइयों! हमें लगता है कि राजा बने इस गीदड़ के नीले रंग के कारण सिंह और बाघ आदि पशु इसकी वास्तविकता को नईं पहचान पा रहे हैं. वे इसे कोई अनोखा जीव मानकर इसका मन-सम्मान कर रहे हैं और यह दुष्ट इस अंहकार और भ्रम में है कि इसकी वास्तविकता को न कोई जानता है और न ही शायद कोई जान पाएगा.’

‘ तो फिर इसकी वास्तविकता का राज खुलेगा कैसे? आखिर कब तक हमें इसकी उपेक्षा सहन करनी पड़ेगी?’ एक गीदड़ बीच में ही बोल पड़ा.

‘ इसका उपाय भी हमने सोच लिया है. यदि हम सब लोग एक ही स्थान पर एकत्रित हुए और गाना प्रारंभ किया. गीदड़ों की आवाज सुनकर कुछ देर तक तो चण्डरव अपने आप पर नियंत्रण रखते हुए चुप रहा. मगर शासन के अंहकार में वह भूल गया था कि वह मूल रूप से गीदड़ जाती का है और शेर तथा बाघ जैसे खूंखार प्राणियों पर प्रभुत्व बनाए हुए है. अंततः अपने साथी गीदड़ों की आवाज सुनकर वह अपनी सहनशक्ति खो बैठा और उन्हीं के स्वर में स्वर मिलाकर ‘हुआ-हुआ’ करके नाचने लगा.

शेर और बाघ ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह उसकी वास्तविकता पहचान गए. वे अपनी मूर्खता पर बहुत लज्जित हुए. उन्हें चण्डरव पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने उसे मार दिया.

कथा-सार

जिस जाती-समाज में प्राणी रहता है, उसकी उपेक्षा करके रहना असंभव हो जाता है. शक्ल-सूरत चाहे बदल जाए लेकिन असलियत सामने आ ही जाति है. ऐसा ही रंगे गीदड़ के साथ हुआ. जिस प्रकार पानी का स्वभाव ढलान की ओर ही बहना है, उसी प्रकार वह रंगा गीदड़ भी स्वभाववश ‘हुआ-हुआ’ करता प्राणों से हाथ धो बैठा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here