लालच बुरी बला – पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

गोदावरी नदी के किनारे पर बसे घने जंगल में एक बहेलिए ने अपना जाल फैलाकर उसके चारों और चावल बिखेर दिए तथा स्वयं चुपचाप छिपकर बैठ गया. थोड़ी देर बाद आकाश में उड़ते कबूतरों के डाल ने चावलों को देखा तो उनके मुंह में पानी भर आया. कबूतरों के मुखिया चित्रग्रीव ने उस सुनसान जंगल में इधर-उधर बिखरे चावलों को देखकर यह अनुमान लगाया कि आसपास जरुर कोई शिकारी छिपकर बैठा है. उसने कबूतरों को निर्देश दिया कि चावलों के लालच में न पडें, यह जरुर किसी शिकारी की चाल है. फिर भी कबुटर अपने आपको रोक नहीं प रहे थे.

चित्रग्रीव ने उन्हें समझाते हुए कहा-इसी शिकारी की तरह एक बुढ़े शेर ने भी प्रलोभन देकर न जाने कितने ही प्राणियों की जान ले ली थी. चित्रग्रीव ने उन्हें एक कथा सुनाते हुए खा, एक शेर इतना अधिक बुढा हो गया था कि उसके लिए अपना भोजन जुटाया कठिन हो गया था. उसे कहीं से सोने का एक कंगन मिला और तुरंत उसे एक युक्ति सूझी.

वह नदी के किनारे खड़ा होकर आते-जाते राहगीरों को सुनाते हुए कहने लगता था, ‘मैं अब बहुत बुढा हो गया हूं. मृत्यु के काफी निकट पहुंच गया हूं. जीवनभर इस पापी पेट के लिए मैने बहुत से जीवों की हत्या की है. अब मुझ में विवेक और वैराग्य के भाव जाग उठे हैं. मेरे पास यह सोने का कंगन है. मैं इसे दान में देकर कुछ पुण्य कमाना चाहता हूं. कोई महानुभाव मुझसे दान लेकर मुझे कृतार्थ करने की कृपा करे.’

‘ तू एक हिंसक और भयंकर प्राणी है. समीप आने पर तू मुझे मारकर खा जाएगा, इसलिए तुझ पर विशवास नहीं किया जा सकता.’ राहगीर कहते.

‘ यह अब संभव नहीं, क्योंकि मैं अत्यधिक बुढा हो चूका हूं. मैने हिंसा का त्याग कर दिया है और धार्मिक प्रवृति का हो गया हूं. मैं अपने पापों का प्रायशिचत करना चाहता हूं इसलिए अब और जीवहत्या न करने की सौगंध खाई है.’ शेर राहगीरों को अपनी बातों में फंसाने की कोशिश करता.

एक लालची व्यक्ति उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गया.

‘ मुझे कंगन पाने के लिए क्या करना होगा?’ उसने पूछा.

‘ कुछ नहीं, तुम केवल इस नदी में स्नान करके आओं और फिर हाथ में जल लेकर अपना नाम बोलकर संकल्प करों और यह कंगन ले लो.’ शेर मन-ही-मन खुश होता हुआ बोला.

राहगीर बिना विचार किए स्नान के लिए नदी में उतर गया. नदी में गहरा दलदल था, जिसमें वह धंसता चला गया और काफी जोर लगाने पर भी बाहर न निकल सका. इस प्रकार शेर को उसका भोजन मिल गया और लोभ के कारण उस राहगीर को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा. वह बुढ़ा और धूर्त शेर प्रतिदिन इस प्रकार लोभी व्यक्तियों को फंसाकर अपना जीवनयापन करता था. चित्रग्रीव ने आगे कहा, ‘ मित्रो! बिना सोच-विचार किए किसी कार्य को नहीं करना चाहिए.’

उन्हीं कबूतरों में से एक लालाची कबुटर ने कहा ‘ बड़े-बूढों का कहां संकटकाल में ही महत्व रखता है. यदि हर कार्य में उनकी बातें मानने लगे तो जीना कठिन हो जाएगा और मिलना भी दुर्लभ हो जाएगा. मित्रों! अगर सभी बातों पर संदेह करने लगोगे तो भूखों मर जाआगे. अतः मेरी बात मानो, चावल खाकर अपनी भूख मिटाओ.’

अपने साथी की बात मानकर कबूतर चावल खाने के लालच में नीचे उतर आए और जाल में फंसकर अपने उस हाथी को भला-बुरा कहने लगे.

चित्रग्रीव ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘ साथियों! आपस में लड़ना छोड़ो और इसे अपने भाग्य का खेल समझकर मुक्त होने के संबंध में सोच-विचार करों. जब संकट आता है तो बुद्धि उलटी हो जाति है. वह न चाहते हुए भी भटक जाति है. कहा भी गया है कि ‘ विनाशकाले विपरीत बुद्धि.’ इसलिए एक-दूसरे पर दोषारोपण न करते हुए एक साथ जोर लगाकर जाल के साथ उड़ने की चेष्टा करों.’

सभी कबूतरों ने चित्रग्रीव कट कथन का पालन किया और बहेलिए द्वारा फेंके गए जाल के साथ उध गए. कबूतरों को अपने जाल के साथ उड़ते देखकर बहेलिया हक्का-बक्का रह गया. बहेलिया कुछ दूर उनके पीछे यह सोचकर भागा कि यह कबूतर संगठित होकर उडे अवश्य जा रहे हैं, परन्तु मुझे विश्वास है कि ये थककर गिर पड़ेंगे और तब मैं एन्हेयं अपने वश में कर लूंगा. लेकिन बहुत दूर तक पीछा करने के बाद भी जब कबूतर नहीं गिरे तो वह निराश होकर हाथ मलता हुआ अपने घर की और लौट चला.

बहेलिए को लौट गया देखकर चित्रग्रीव ने अपने साथियों से कहा, ‘ साथियों! मेरा एक मित्र हिरण्यक नामक चूहा गण्डकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है. वह इस जाल को काट देगा.’

हिरण्यक के निवास पर पहुंचकर चित्रग्रीव ने उसे पुकारा तो मूषकराज अपने मित्र की आवाज पहचान कर अपने बिल से बाहर निकल आया. जैसे ही हिरण्यक की निगाह जाल पर पड़ी तो उसने आश्चर्यचकित होकर मित्र से पूछा, ‘यह क्या! तुम किसी शिकारी के जाल में फंसे हुए हो?’

‘ यह सब हमारे लालच और मूर्खता का परिणाम है.’ चित्रग्रीव ने दुखी मन से कहा.

‘ लोभ-लालच में पड़कर प्रायः प्राणी मुर्ख बन ही जाता है. तुम घबराओ नहीं, मैं अभी तुम्हारे बंधन खोलता हूं.’

यह कहकर हिरण्यक अपने मित्र के बंधन काटने लगा. चित्रग्रीव ने उसे रोकते हुए कहा, ‘ पहले मेरे साथियों के बंधन काटो मित्र, उन्हें मुक्त करने के बाद ही मुझे इस जाल से मुक्ति दिलाना.’

‘ मेरे दांत अब काफी कमजोर हो गए हैं, मित्र! इसलिए मैं सबसे बंधन नहीं काट पाऊंगा.’ हिरण्यक ने अपनी मज़बूरी बताई.

‘ नहीं मित्र! जब तक मुझ पर आश्रित मेरे साथी स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक मैं भी इस जाल से मुक्त होऊंगा. अपने लिए तो सब सोचते हैं, लेकिन जो दूसरों के विषय में नहीं सोचता वह पाप का भागी होता है. मैं पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता.’ चित्रग्रीव ने हिरण्यक से आग्रह किया.

‘ तुम धन्य हो मित्र! जब तक मेरे दांत हैं, तब तक मैं इस जाल को काटता रहूंगा हिरण्यक ने यह कहकर सबको बंधनमुक्त किया.

चित्रग्रीव ने हिरण्यक के प्रति कृतज्ञता जताई और विदा मांगी. हिरण्यक ने भविष्य मैं इस प्रकार लोभ-लालच में न पड़ने की चित्रग्रीव को सलाह दी और सावधान रहने के कहा तो चित्रग्रीव ने जवाब दिया, ‘यह सब भाग्य का खेल था मित्र. बुरे वक्त पर बुद्धि ही बदल जाती है, फिर भी मैं तुम्हारी सलाह को याद रखूंगा. इसके बाद दोनों मित्रों ने एक-दूसरे से विदा ली और अपने-अपने निवास की ओर चल दिए.

कथा-सार

लोभ, लालच मनुष्य के प्रबलतम शत्रु हैं. इनके मोह में फंसकर प्राणी कुछ भी करने को तैयार हो जाता है. यहां तक कि अपने प्राणों को भी संकट में डाल देता है, जैसा लालची कबूतरों के साथ हुआ. बड़े-छोटे का ध्यान किए बिना अच्छे मित्रों की संख्या बढ़ाते जानी चाहिए तथा व्यर्थ का अलंकार नहीं पालना चाहिए. धनी हो या निर्धन, राजा हो या फकीर-नल से पानी पीने के लिए झुकना सभी को पड़ता है.

 

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