अनमोल चिड़िया – पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

चारों और पहाडो से घिरा हुआ एक वन था। उस वन में पीपल का एक वृक्ष भी था। उस वृक्ष पर एक विचित्र चिड़िया रहती थी, जो स्वर्णिम विष्ठा करती थी, अर्थात विष्ठा के रूप में स्वर्ण निष्कासित करती थी। उसकी विष्ठा धरती पर गिरते ही स्वर्ण में बदल जाया करती थी।

एक बुढ़े व्याध ने जब अपनी आंखों से इस आश्चर्य को देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि उसने अपने साठ-सतर वर्ष के इस व्यवसाय में ऐसी विचित्रता कभी देखी ही नहीं थी। वह सोचने लगा यह कैसे सम्भव हो सकता है कि एक जंगली चिड़िया की विष्ठा धरती पर गिरते ही स्वर्ण में परिवर्तित हो जाती है। लेकिन उसके सामने तो प्रत्यक्ष और प्रमाण दोनों ही थे, इसलिए उसे विश्वास करना ही पड़ा।

बुढा व्याध सोचने लगा-अगर यह चिड़िया मेरे जाल में फंस गई तो मैं मालामाल हो जाऊंगा। इस चिड़िया को खूब खिलाऊंगा ताकि यह ज्यादा-से-ज्यादा स्वर्णिम विष्ठा करे। यह विचार करके बुढ़े व्याध ने पीपल के उस वृक्ष पर अपना जाल डाल दिया और उस चिड़िया के फंसने की प्रतीक्षा करने लगा।

चिड़िया ने वृक्ष पर पड़े जाल को नहीं देखा और व्याध के जाल में फंस गई। व्याध चिड़िया को अपने अधिकार में लेकर खुशी-खुशी घर की और चल दिया। परन्तु अचानक ही उसके घर की और बढ़ते कदम रुक गए। वह सोचने लगा यह चिड़िया विचित्र और स्वर्ण विष्ठा त्यागनेवाली अवश्य है। लेकिन यह किसी भूत-प्रेत अथवा पिशाच का रूप हुआ तो कहीं मैं धनवान होने के बजाय किसी संकट में न फंस जाऊं।

काफी देर सोच-विचार करने के बाद बुढ़े व्याध ने यह निष्कर्ष निकला कि इस चिड़िया को घर न ले जाकर राजा को दे दूं और पुरस्कार प्राप्त कर लूं। यह विचार आते ही वह राजमहल की ओर चल दिया और राजमहल में पहुंचकर राजा से कहा-‘महाराज! यह एक विचित्र चिड़िया है, इसकी विष्ठा धरती पर गिरते ही सोने की हो जाती है। इसलिए मैंने सोचा की इसे अपने अधिकार में लेकर आपको दे दूं, ताकि इसकी स्वर्णिम विष्ठा से राजकोष में बढ़ोतरी हो।’

राजा उस चिड़िया को पाकर बहुत खुश हुआ उसने व्याध को बहुत-सा धन पुरस्कार के रूप में प्रदान किया। राजा ने अपने सेवकों को बुलाकर कहा-‘यह चिड़िया अनमोल है, इसकी देखभाल में कोई कमी न रहने पाए।’

सेवकों ने राजा का आदेश मानकर उस चिड़िया को एक सुन्दर से पिंजरे में कैद कर दिया। और उसके खाने-पीने का सामान भी उसमे रख दिया। इस विचित्र चिड़िया के विषय में जब मंत्री को पता चला तो उसने राजा के पास जाकर निवेदन किया-‘महाराज वह व्याध इस जंगली चिड़िया को अनमोल और सोने की विष्ठा करने वाली बताकर आपको मूर्ख बना गया है। अगर यह सोने की विष्ठा करती होती तो वह व्याध स्वयं इसे पालकर धनवान नहीं बन जाता।’

राजा को मन्त्री की बातों में सचाई नजर आई और उसने अपने सेवकों को बुलाकर उस चिड़िया को बंधमुक्त करने का आदेश दे दिया।

बंधमुक्त होते ही चिड़िया अपने निवास पर पहुंचकर कहने लगी-‘पहले तो व्याध के जाल में फंसनेवाली मूर्ख मैं ही थी, दूसरा मुर्ख व्याध था जिसने हाथ में आया भाग्य राजा को सोंप दिया । पहले व्याध के और फिर मन्त्री के कहने में आनेवाला राजा और बिना जांच किए मुझे बंधमुक्त करने वाली मन्त्री भी मूर्ख था। लगता है इस धरती पर मूर्ख ही मूर्ख भरे पड़े हैं।, और फिर वह चिड़िया खुशी से पीपल के उस वृक्ष पर एक डाल से दूसरी डाल पर उछलकूद करती हेई उड़ान भरने लगी।

कथा-सार

वह व्यक्ति मूर्खो की श्रेणी में आते हैं जो बिना जांचे-परखे, लोगों की बातों में आकर अपने भाग्य को अपने हाथों से गंवा देते हैं, जैसा की इस कथा में पहले व्याध ने और फिर मन्त्री के कहने में आकर राजा ने किया।

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