सेवक का प्रतिशोध – पंचतंत्र कहानी

0
123
panchtantra ki kahaniya

वर्धमान नगर में आभूषणों का एक व्यापारी दंतिल सेठ रहता था. उसने अपने लोकहित के कार्यो से राज्य की पूरी प्रजा का मन मोह लिया था. धेरे-धीरे उसकी ख्याति राजा के कानों तक जा पहुंची. एक दिन वहां के राजा मदन मोहन ने दंतिल सेठ को महल में बुलाया. राजा उसके व्यवहार से काफी प्रसन्न हुआ और उसे अपने निवास में आने-जाने की खुली छुट दे दी. अब जिस रानी को कोई आभूषण बनवाना होता था तो दंतिल सेठ को ही बुलाया जाता. इस प्रकार उसे अब रनिवास में भी आने-जाने की खुली छुट थी.

रह्महल में बेरोक-टोक आने-जाने के कारण दंतिल सेठ का सम्मान नगर में और ज्यादा बढ़ गया था. एक बार सेठ ने अपनी कन्या के विवाह के अवसर पर नगर के सभी प्रतिष्ठित लोगों का साथ-साथ राजपरिवार के सदस्यों और राजकर्मचारियों को भी बुलाया दंतिल सेठ ने खाने-पीने के बाद सभी आमंत्रित और सम्मानित अतिथियों को बहुमूल्य उपहार दिए. गोरम्भ नाम का एक नौकर भी रानियों के साथ आया था.

दंतिल सेठ के सामने ही उसके सेवकों ने किसी बात पर गोरम्भ को वहां से बहार निकाल दिया. गोरम्भ दुखी मन से घर लौट आया. उसने मन-ही-मन दंतिल सेठ से बदला लेने का निश्चय किया और उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करने लगा.

एक दिन प्रातःकाल गोरम्भ ने राजा को अर्धनिद्रा की अवस्था में देखा तो बडबडाते हुए बोला, ‘दंतिल सेठ का यह दुस्साहस कि रानी का आलिंगन करे. राम-राम! क्या जमाना आ गया है? जिस थाली में खाना उसी में छेद करना.’

‘ गोरम्भ यह क्या बक रहा है तू? क्या सचमुच दंतिल रानी का आलिंगन करता है?’ राजा ने सचेत होकर पूछा.

‘ महाराज! मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा. मेरे मुंह से ऐसा कुछ निकला है?’ गोरम्भ ने भयभीत होने का अभिनय करते हुए कहा.

राजा ने सोचा, लगता है गोरम्भ के मुंह से सत्य निकल गया है लेकिन अब डर के कारण सत्य को छिपा रहा है. इसके बाद राजा अपनी रानी के दंतिल सेठ के साथ संबंधों पर संदेह करने कागा और उसने दंतिल सेठ के रनिवास में निर्बाध प्रवेश के अपने आदेश को वापस ले लिया.

दंतिल सेठ अपने प्रति राजा के व्यवहार में अचानक आए परिवर्तन के कारण को ढूढने की चेष्टा करने लगा. इधर गोरम्भ दंतिल सेठ को चिढ़ाने की गरज से उधर से गुजारा तो सेठ को याद आ गया कि अपनी कन्या के विवाहवाले दिन उसने उसका अपमान कर दिया था. इसलिए हो सकता है, इसने राजा के कान भरे हों. वह गोरम्ब के पास आया और उससे क्षमा मांगी. गोरम्ब दंतिल सेठ को उसका गौरव वापस दिलाने का आश्वासन देकर घर वापस लौट गया.

अगले दिन प्रातःकाल जब राजा ने अर्धनिद्रित अवस्था में था तो गोरम्ब बडबडाते हुए बोला, ‘हमारे महाराज को देखो, शौच करते समय ककड़ी खाते हैं.’

‘यह क्या बक रहा है?’ राजा ने तत्काल गोरम्ब को डाटते हुए कहा.

‘महाराज! क्या मैंने कुछ कहा है?’ गोरम्ब ने भोलेपन से पूछा.

गोरम्ब की बात पर राजा ने सोचा, लगता है गोरम्ब की कुछ-न-कुछ बडबडाते की आदत बन गई है. जरुर रानी और दंतिल सेठ के आलिंगनवाली बात भी बकवास और कोरा झूठ थी. यह सोचकर राजा ने दंतिल सेठ को पुनः रनिवास में निर्बाध प्रवेश की अनुमति दे दी. जिससे दंतिल सेठ का खोया मान-सम्मान उसे वापस मिल गया.

कथा-सार

गरीब हो या धनी-सम्मान सभी का होता है. किसी को तुच्छ जानकर उसका अपमान करना मर्यादाहीनता की श्रेणी में आता है. अपमान का डंक बेहद पीड़ादायक होता है और पीड़ित तुरंत इसका प्रतिशोध लेना चाहता है, यही गोरम्भ ने किया. दूसरी महत्वपूर्ण शिक्षा जो इस कथा से मिलती है, वह यह कि मात्र कानों सुनी बात पर विशवास करना ठीक नहीं, कभी-कभी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here