नीतिवान संन्यासी- पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

­­­हिरण्यक नामक चूहे और लघुपतनक नामक कौवे में प्रगाढ़ मित्रता थी. हिरण्यक के लिए लघुपतनक हर रोज कहीं-न-कहीं से बढ़िया पदार्थ लाता. इस तरह अपने लघुपतनक ने अपने उपहारों  से हिरण्यक को अपना ऋणी बना लिया था. एक दिन हिरण्यक के पास आकर लघुपतनक ने आंखों में आंसू भरकर उदास और बुझे स्वर में कहा, ‘मित्र! अब में शीघ्र ही तुमसे और इस वन से जुदा हो जाऊंगा.’

‘ ऐसी कौन-सी विपति आ पड़ी हैं, जिसकी वजह से तुम अपने मित्र और इस वन को छोड़कर जाने के सोच रहे हो?’

‘मित्र! इस प्रदेश में अकाल पद गया है. लोंगों के भूखे मरने की स्तिथि उत्पन्न हो गई है. इससे भी भड़कर सोचनीय बात यह है कि लोंगों ने पक्षियों को फंसाने के लिए घर-घर में छतों पर जाल डाल रखे हैं. सौभाग्यवश ही मैं इस जालों से किसी प्रकार बाख पाया हूं. अब मुझे अपना देश छोड़ना पड़ रहा है. इसलिए में काफी दुखी और बेचैन हूं.’ लघुपतनक ने रुंघे में कहा.

‘ कहां जाओगे मित्र?’ हिरण्यक ने पूछा.

‘ दक्षिण दिशा में एक दुर्गम वन में एक बहुत विशाल सरोवर है. वहां आपके भी अधिक पुराना मेरा एक घनिष्ठ मित्र मंथरक कछुआ रहता है. वह मुझे मछलियों के मांस के टुकडे दे दिया करेगा, जिससे मैं अपना शेष जीवन सुखपूर्वक बिता दूंगा.’ लघुपतनक ने अपने विचारों से मित्र को अवगत कराया.

‘ मित्र! मुझे आपसे कुछ ऐसा मोह हो गया है किआपके बिना रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता. इसलिए इस स्थान को छोड़कर मैं भी आपके साथ चलूंगा.’ हिरण्यक ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा.

‘ आपको क्या कष्ट है मित्र, जो आप अपनी जन्मभूमि और सुखद आवास को छोड़ने के लिए तैयार हो गए है?’ लघुपतनक ने आश्चर्य से पूछा.

‘ यह बड़ा गंभीर और विस्तृत विषय है. मैं यह सब गंतव्य स्थान पर पहुंचने पर ही बताऊंगा.’

‘ मैं तो आकाशमार्ग से जाऊंगा और आप थल मार्ग से चलेंगे. हम दोनों का साथ कैसे निभेगा?’ लागुपतांक ने गंभीर स्वर में कहा.

‘ मित्र! यदि आप मेरे सच्चे मित्र हैं और मेरे प्राणों की रक्षा करना चाहते हैं तो अ[नी पीठ पर बैठाकर ले चलें. इसके अलावा और कोई चारा नहीं है.’ हिरण्यक ने अपनी मित्रता का वास्ता दिया.

‘ आपकी सेवा तो मेरा परम सौभाग्य होगा. आप निश्चिंत होकर मेरी पीठ पर बैठ जाइए.’ कहकर लघुपतनक उसे लेकर उड़ चला.

निश्चित स्थान पर पहुंचकर कौवे ने चूहे को अपनी पीठ से उतारा. तालाब के किनारे पर एक वृक्ष की कोटर में हिरण्यक को बैठाने के बाद लघुपतनक ने अपने मित्र मंथरक कछुए को आवाज देते हुए कहा, ‘ मित्र! शीघ्र जल से बाहर आओ, मैं आपका मित्र आपसे मिलने आया हूं.’

मंथरक तत्काल जल से बाहर आया. प्रेम पुलकित होकर दोनों मित्र वृक्ष के नीचे बैठकर एक-दुसरे का कुशलक्षेम पूछने लगे. इसी बीच हिरण्यक ने आकर मंथरक को प्रणाम किया और फिर चुपचाप बैठ गया. लघुपतनक ने मंथरक से हिरण्यक का परिचय कराते हुए कहा, ‘ मित्र! यह मेरा प्राणप्रिय मित्र हिरण्यक है. मेरे इस परमप्रिय मित्र के गुणों की गणना कर पाना असंभव है.’

मंथरक ने लघुपतनक से हिरण्यक के वैराग्य का कारण पूछा तो लघुपतनक हिरण्यक से बोला, ‘मित्रवर! आपने यहां पहुंचने पर सारा विवरण सुनाने को कहा था. अब मेरे मित्र भी जानने के इच्छुक हैं. यदि कुछ गुप्त रहस्य नहीं तो आप बताने की कृपा करें?’

अपने मित्र लघुपतनक के आग्रह को सुनकर हिरण्यक अपनी व्यथा कथा सुनाने लगा.

नगर के बाहर बने शिव मंदिर में ताम्रचूड़ नामक एक संन्यासी रहता था, जो उस नगर में भिक्षा मांगकर बड़े सुख से अपना जीवन व्यतीत करता था. वह अपने खाने-पीने से बचे अन्न-धान्य को एक भिक्षा पात्र में रख देता था और फिर उस पात्र को रात्री में खूंटी पर लटकाकर निशींचतता से सो जाया करता था. प्रातः-काल ताम्रचूड़ स्नान पूजादी से निवृत होकर उस अन्न-धान्य आदि को मंदिर के बाहर बैठनेवाले भिखारियों में बांट देता था.

एक दिन मुझे अपनी किसी साथी से यह सुचना मिली की ताम्रचूड़ प्रति रात्रि खूंटी पर टंगे पात्र में स्वादिष्ट अन्न सामग्री रखता है. उसने वह भी बताया कि खूंटी इतनी उंची है कि साथी चूहे प्रयत्न करने पर भी वहां तक नहीं पहुंच पाते.

अपने साथी की बात सुनकर मैं उसी समय उसके साथ चल दिया. साथी द्वारा खूंटी पर लटकी हांडी को दिखाए जाने पर मैंने एक ही छलांग तथा अन्य साथियों ने जी भरकर उस स्वादिष्ट भिजन का आनंद लिया. अब यह हमारा हर रात का नियम-सा बन गया.

आखिरकार संन्यासी ताम्रचूड़ मुझे डराने और मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कहीं से एक फटा बांस उठा. वह सोते समय बांस को बजाता रहता और मैं चोट लगने के भय से बिना कुछ खाए ही भाग जाता. इस तरह रातभर मुझ में और संन्यासी में संघर्ष चलता रहता. जैसे ही उसे नींद आती मैं हंडिया पर हाथ साफ कर जाता.

एक दिन लंबी तीर्थयात्रा से घर को लौटता उस संन्यासी का एक मित्र वृहतस्फिक उससे मिलने आया. रात के समय जब दोनों मित्र सोने लगे तो वृहतस्फिक ताम्रचूड़ को अपनी तीर्थयात्रा का विवरण सुनाने लगा. लेकिन वृहतस्फिक ने जब ताम्रचूड़ को बार-बार फटे बांस को धरती पर पटकते देखा तो उसने समझा कि ताम्रचूड  उसकी अपेक्षा कर रहा है. वह क्रोधित स्वर में बोला, ‘मित्र! यदि तुम्हें मेरी बातें सुनने में रूचि नहीं है तो मैं प्रातः होते ही यहां से चला जाऊंगा. मैं तो आपको अपना घनिष्ठ मित्र मानता था, क्लय्किन आपके व्यवहार से मुझे बेहद निराशा हुई है.’

‘ मित्रवर! आप मुझे गलत मत समझिए. एक चूहे ने मुझे कुछ दिनों से परेशान कर रखा है. मैं भिक्षा से प्राप्त खाने-पीने की बची सामग्री को एक हांडी में रखकर उसे खूंटी से लटका देता हूं ताकि दुसरे दिन वह सामग्री अन्य भिक्षुओं को दे सकूं. समझ में नहीं आता कि कैसे एक चूहा इतनी उंची छलांग लगाता है और उस हांडी की सामग्री पर अपना अधिकार कर लेता है. मैं उसे डराने-भगाने के लिए ही इस फटे बांस को धरती पर पटकता हूं.’ ताम्रचूड़ ने अपने मित्र को समझाते हुए कहा.

‘ ओह! यह बात है, आपको मालुम है कि इसका बिल कहां है?’ वृहतस्फिक ने पूछा.

‘ नहीं.’ ताम्रचूड़ ने अनभिज्ञता प्रकट की.

‘ लेकिन यह जरुर निश्चित समझिए कि इस चूहे का बिल किसी खजाने पर है. धन की गर्मी के कारण ही यह चूहा इतना अधिक उछल-कूद सकता है. इसलिए इस चूहे के बिल लका पता लगाए बिना आप आसानी से इससे पीछा नहीं छुड़ा पाएंगे.’ वृहतस्फिक ने तर्क देकर ताम्रचूड़ संन्यासी को समझाया.

‘ इस चूहे का बिल कहां है-निश्चित रूप से तो कुछ नहीं कह सकता परंतु इतना अवश्य है कि जब भी वह आता है तो पूर डाल-बल के साथ ही आता है.’

‘ तो फिर चिंता की कोई बात नहीं. उसके बिल तक पहुंचना कोई कठिन कार्य नहीं है. बस एक कुदाल लाकर रख लें ताकि उसके बिल को खोदने में असुविधा न हो.’ वृहतस्फिक ने अपनी योजना बताते हुए कहा.

ताम्रचूड़ मंदिर के भीतर से एक कुदाल ले आया. कुदाल को एक और रखने का संकेत करते हुए वराहस्फिक ने कहा, ‘अब निश्चिंत होकर सो जाइए, यह सुबह मेरा चमत्कार देखना.’

हिरण्यक ने आगे की आपबीती सुनाते हुए कहा-‘प्रातः काल होते ही वह दोनों उठकर खड़े हो गए. किसी मनुष्य के पांव पड़ने से पहले ही मेरे परिवार के पदचिन्हों का पीछा करते हुए मेरे बिल तक आ पहुंचे. मैं तो अवसर पाते ही निकल भागा परंतु उन दोनों दुष्ट सन्यासियों ने मेरे बिल को खोदकर उसके भीतर छिपे कोष को निकाल लिया. उसके बाद वृहतस्फिक ने ताम्रचूड़ से कहा, ‘मित्र! अब आप निश्चिंत होकर सोना. यह चूहा अब आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.’

उसका विचार ठीक था. अपने कोष को लुटा देखकर मैं टूट गया. मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया. फिर भी मैं अपने परिवार के साथ पहले की ही तरह मंदिर में गया तो मैने ताम्रचूड़ को फटा बांस धरती पर पटकते देखा और वृहतस्फिक को उसे रोकते तथा यह कहते सुना, ‘ आपको अब बांस को धरती पर पटकते की आवश्यकता नहीं, वह चूहा अब आपको कोई नुक्सान नहीं पहुंचा पाएगा.’

उसके यह वचन सुनकर मुझे क्रोध आ गया. मैं अपनी पूरी शक्ति के साथ खूंटे पर कूदा, परंतु वहां तक नहीं पहुंच पाया. मैने कई बार प्रयत्न किया लेकिन हर कोशिश व्यर्थ गई. मेरे इस असफल प्रयास को देखकर वृहतस्फिक ने ताम्रचूड़ से कह, ‘ देखो मित्र! इस चूहे की उछल-कूद को देखा. अब यह चाहे जितना भी बल क्यों न लगा ले, खूंटी तक कभी नहीं पहुंच पाएगा.’

मैंने एक बार संन्यासी द्वारा लिए अपने धन को पुनह प्राप्त करने का प्रयास किया परंतु कामयाब नहीं हो सका. क्योंकि ताम्रचूड़ संन्यासी धन की पोटली को हमेशा अपने तकिए के नीचे रखकर उस पर सोता था और जागते समय भी उस पर कड़ी निगरानी रखता था. इसलिए यह लगभग निश्चित हो गया था कि मेरे लिए उस धन को पुनः प्राप्त करना किसी भी प्रकार संभव नहीं. मेरे परिजन मुझसे कन्नी काटने लगे थे.

अपने परिजनों के इस ने मुझे इतना अधिक व्यथित कर दिया कि मैंने अपने लुटे धन को पाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने निश्चय किया. इस बात में कोई शक नहीं था कि इसमें प्राणों का खतरा था लेकिन फिर भी मैंने दरिद्रता और अपमान का जीवन जीने से मरना अच्छा समझा.

अपने मन में तरह-तरह की योजनाएं बनाता हुआ मैं संन्यासी के तकिए के नीचे राखी धन की पोटली

हथियाने चल पड़ा. मैं अथक प्रयासों के बाद मिले अपने धन को उठाकर ला ही रहा था कि वह दुष्ट संन्यासी जाग उठा और उसने हाथ में पकड़े फटे बांस से मेरे सिर पर ऐसा तेज प्रहार किया, जो मैं ही जानता हूं. यह तो मेरी आयु शेष थी, जो मैं बच गया.

अपनी आपबीती सुनाने के बाद हिरण्यक ने कहा, ‘खोया हुआ धन मेरे भाग्य में नहीं था, तभी मैं उसे प्राप्त नहीं कर सका और धनहीन होकर परिवार के लोगों के साथ रहना मुझे सम्मानजनक नहीं लगा. इसलिए मैं अपने मित्र लघुपतनक के साथ यहां आया हूं.’

‘मित्र! लघुपतनक वास्तव में आपका सच्चा हितैषी और मित्र है. भिका होने पर भी इसने आपका भक्षण नहीं किया. संकटकाल में साथ निभानेवाले को ही सच्चा मित्र कहा गया है. सुख-समृद्धि के दिनों में तो अच्छे और बुरे सभी लोग मित्र बन जाते हैं.’ यह कहने के बाद मंथरक खामोश हो गया.

मंथरक के विचार सुनकर हिरण्यक धीरे-धीरे अपने धन की हानि को भूलने लगा और तालाब के किनारे बिल बनाकर सुखपूर्वक रहने लगा.

कथा-सार

धन ही है, जो समस्त सुखों का वाहक है. धन नहीं तो आत्म-सम्मान भी नहीं, समाज में, परिजनों में कोई पूछनेवाला नहीं. धनी व्यक्ति का धन चला जाए तो वह उसे पुनः प्राप्त करने के लिए छटपटा उठता है. लेकिन धन इतना महत्वपूर्ण भी नहीं कि उसके लिए प्राण दांव पर लगा दिए जाएं. जीवन शेष रहेगा, तो धन पुनः आ जाएगा. यही सब हिरण्यक चूहे ने किया और अपने गए धन का लोभ छोड़कर उसने नए सिरे से जीवन शुरू किया.

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