भाग्य का खेल – पंचतंत्र कहानी

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panchtantra ki kahaniya

चंद्रिका नगर के निवासी लालाराम नामाक बनिये का लड़का सौ रुपये मुल्यवाली एक पुस्तक खरीद लाया. उस पुस्तक में एक स्थान पर लिखा था कि मनुष्य अपने भाग्य का लिखा तो बड़ी ही आसानी से पा लेता है, लेकिन जो भाग्य में नहीं लिखा होता उसे जी-तोड़ परिश्रम करने के उपरान्त भी पाने में असमर्थ रहता है. यह एक अटल सत्य है और इसमें परिवर्तन के लिए कोई भी उपाय नहीं है.

बनिये ने इतनी महंगी पुस्तक खरीदने पर अपने पुत्र की काफी भत्र्सना की. पुत्र द्वारा अपने निर्णय को उचित बताने पर लालाराम क्रोधित हो उठा और अपने पुत्र को निखटटू तथा विवेकहीन बताकर घर से निकल दिया.

बनिया का बेटा अपने पिता के व्यवहार से दुखी होकर किसी दुसरे शहर में चला गया. जो भी उसके सम्पर्क में आता तो वह एक ही वाक्य में अपना परिचय देता-‘ मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प् लेता है.’

एक दिन राजा की लड़की चंद्रवती किसी उत्सव को देखने उस नगर में आई तो उसकी द्रष्टि एक सुंदर राजकुमार पर पड़ गई. राजकुमारी ने अपनी एक सखी से उस राजकुमार से अपना मिलाप कराने के लिए प्रयास करने का अनुरोध किया. सखी ने राजकुमार के पास जाकर अपनी स्वामिनी की पीड़ा का वर्णन करके उससे राजकुमारी के पास चलने की प्रार्थना की.

राजकुमार ने राजकुमारी की सखी से महल के भीतर गुप्त रूप से जाने का उपाय पूछा तो सखी ने कहा, ‘ मैं रात्रि में महल के ऊपर से चमड़े की एक मजबूत रस्सी नीचे लटका दूंगी, आप उसे उसे पकड़कर निश्चिंतता से ऊपर आ जाइएगा. मेरी स्वामिनी आपकी भरपूर आवभगत करेगी.’

रात्रि होने पर राजकुमार ने मन में विचार किया कि इस प्रकार छिपकर किसी पराई नारी से मिलना सर्वथा अनुचित होगा. राजकुमार ने उधर न जाने का ही निश्चय कर लिया. उधर जब बनिये का लड़का संयोगवश रात में राजमहल के संपी पहुंचा तो नीचे लटकती रस्सी को देखकर कौतूहलवश ऊपर चढ़ गया. राजकुमारी ने उसे ही राजकुमार समझकर उसे छिपाने के विचार से अंधेरा करके उसे अपनी बांहों का सहारा दिया और स्नेह आदर के साथ अपने पलंग पर बैठा दिया. राजकुमारी ने प्रेमभरे सब्दो से पूछा, ‘ आप कुछ बोलते क्यों नहीं?’

यह सुनकर उसने अपना प्रिय वाक्य दोहरा दिया, ‘ मनुष्य प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है.’

यह शब्द सुनते ही राजकुमारी को आभास हो गया कि यह युवक राजकुमार नहीं है, अतः उसे राजमहल से बाहर निकाल दिया.

आधी रात का समय था. महल से निकलकर बनिये का पुत्र समीप के एक खंडहनुमा मंदिर में आकर सौ गया. संयोगवश उस नगर का रक्षक अपनी प्रेयसी से मिलने वहां आ पहुंचा. उसको वहां सोया देखकर नगर रक्षक ने उसे जगाकर पूछा, ‘ कौन हो भाई तुम, यहां क्यों सो रहे हो?

‘ भाई मुझे अभागे का न तो कोई घर है न द्वार. दुनिया में मेरा कोई सगा-संबंधी भी नहीं है.’

‘ कोई काम-धंधा क्यों नहीं करता?’ नगर रक्षक ने सख्त लहजे में पूछा.

‘ कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे, मनुष्य प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है.’ उसने अपना वहीं पुराना रटा-रटाया वाक्य दोहरा दिया.

नगर रक्षक ने समझा कोई बेवकुफ है. इसलिए उसने उससे कहा, ‘ यहां सोना मना है, कहीं और जाकर सो.’

नगर रक्षक का आदेश सुनकर वह उठकर चल दिया. परंतु अर्धनिद्रा की स्तिथि में होने के कारण कुछ दूर जाकर एक छोटे-से मकान के आंगन में जाकर सो गया. संयोगवश नगर रक्षक की युवा पुत्री विनयवती अपने प्रेमी से मिलने की प्रतीक्षा में निशिचत स्तान पर बैठी थी. उसने अंधेरे में उसी को अपना प्रेमी समझा और बोली, ‘ क्या अभी तक आप मुझसे नाराज हैं, जो मुझ से बोल नहीं रहे?’

‘ मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है.’ उसने अपने वहीं शब्द उसके सामने भी दोहरा दिए.

उसके इस प्रकार मुंह खोलते ही विनयवती अपनी मूर्खता और अधीरता पर पश्चाताप करने लगी. उसने बनिये के लड़के को उसी वक्त वहां से भगा दिया.विनयवती द्वारा भगा दिए जाने के बाद वह नगर की गलियों में भटकने लगा. रास्ते में उसे गाजे-बाजे के साथ जाति बारात मिली तो वह भी उसी मौन शामिल हो गया. बारात जब लड़कीवालों के घर पहुंची और दुल्हन हाथ में जयमाला लिए जैसे ही दुल्हे के पास आई, उसी वक्त एक मदमस्त हाथी वहां आ पहुंचा. उसे देखते ही सारे बाराती लड़की को चोधकर इधर-उधर छिप गए. दूल्हा भी दुल्हन को छोड़कर कहीं जा छिपा. दुल्हन बनकर खड़ी लड़की हाथी को देखकर थर-थर कांपने लगी. बनिये के लड़के ने साहस करके उस लड़की का हाथ थामा और उसे सुरक्षित स्थान पर ले गया.

हाथी के चले जाने के बाद सारे बाराती और दूल्हा एक जगह इकटठे हुए. लड़केवालों ने लड़की के व्यवहार पर आपति करते हुए कहा, ‘ तुम्हारी लड़की गैर मर्द को स्पर्श कर चुकी है.’

‘ आप लोग कैसी बांटे कर रहे हैं? लड़की के पिता ने वर पक्षवालों के हाथ जोड़ते हुए कहा.

तभी दुल्हन बनी निरपराध लड़की आगे बढ़ी और बोली, ‘ मुझे मौत के मुंह में धकेलकर केवल अपने प्राणों की चिंता करनेवाला मेरा पति होने के योग्य ही नहीं है. मैं स्वयं उससे शादी करने के लिए तैयार नहीं हूं.’

‘ ब… बेटी यह तू क्या कर रही है?’ लड़की का पिता घबराकर बोला.

‘ मैं ठीक कह रही हूं पिताजी, संकट में साथ निभानेवाले और अपने प्राणों को संकट में डालकर मेरी रक्षा करनेवाले इस युवक से ही मैं विवाह करूंगी.’

इस वाद-विवाद में सुबह हो गई. संयोगवश राजकुमारी और नगर रक्षक की पुत्री विनयवती भी वहां आ पहुंची. लोगों से सुचना पाकर राजप्रमुख भी वहां आ पहुंचा. राजप्रमुख ने बनिये के लड़के से पूछा, ‘ कौन हो तुम बेटे?’

‘’ मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है.’ उसने एक बार फिर अपने वहीं सब्द दोहरा दिए.

इस वाक्य को सुनते ही राजकुमारी के मुंह से निकल पड़ा-‘विधाता भी उसे रोक नहीं सकता.’

उधर विनयवती भी अपने आप पर संयम खो बैठी और कहने लगी, ‘ मुझे न अपने किए पर दुख है और न ही आश्चर्य.’

राजा और नगर रक्षक को अपनी-अपनी पुत्रियों के मुंह खोलने पर काफी हैरानी हुई. राजा न इस सारे काण्ड की गुप्थ्रूप से जांच करवाई और सत्य का पता चलने पर दोनों कन्याओं का विवाह भी बनिये के लड़के से कर दिया. सेठ ने भी अपनी पुत्री की इच्छानुसार उसका विवाह उसी के साथ कर दिया. इस प्रकार उसने ‘ अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लिया.’

कथा-सार

मनुष्य अपने भाग्य से ज्यादा और समय से पहले कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता. इसलिए मनुष्य को अपना धन नष्ट हो जाने पर मायूस नहीं होना चाहिए और यदि कुछ अनायास ही प्राप्त हो जाए तो उसमें आश्चर्य भी नहीं करना चाहिए. इस सारे खेल के पीछे भाग्यरचियता का ही हाथ होता है. न चाहते हुए इ बनिये के बेटे को इतना कुछ मिल गया, जो वह मांगकर भी प्राप्त नहीं करब सकता था.

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